Ipc धारा १३० : (राजकैदी या युद्धकैदी) ऐसे कैदी के निकल भागने में सहायता देना, उसे छुडाना या संश्रय देना :

भारतीय दण्ड संहिता १८६०
धारा १३० :
(राजकैदी या युद्धकैदी) ऐसे कैदी के निकल भागने में सहायता देना, उसे छुडाना या संश्रय देना :
(See section 158 of BNS 2023)
अपराध का वर्गीकरण :
अपराध : ऐसे कैदी के निकल भागने में सहायता देना, उसे छुडाना या संश्रय देना या ऐसे कैदी के फिर से पकडे जाने का प्रतिरोध करना ।
दण्ड :आजीवन कारावास या दस वर्ष के लिए कारावास, और जुर्माना ।
संज्ञेय या असंज्ञेय :संज्ञेय ।
जमानतीय या अजमानतीय :अजमानतीय ।
शमनीय या अशमनीय : अशमनीय ।
किस न्यायालय द्वारा विचारणीय है :सेशन न्यायालय
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जो कोई जानते हुए किसी राजकैदी या युद्धकैदी को विधिपुर्ण अभिरक्षा से निकल भागने में मदद या सहायता देगा, या किसी ऐसे कैदी को छडाएगा या छडाने का प्रयत्न करेगा, या किसी ऐसे कैदी को, जो विधिपूर्ण अभिरक्षा से निकल भागा है, संश्रय देगा या छिपाएगा या ऐसे कैदी के फिर से पकड जाने का प्रतिरोध करेगा या करने का प्रयत्न करेगा, वह १.(आजीवन करावास) से, या दोनों में से किसी भांति के कारावास से दण्डित किया जाएगा, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, और जुर्मान से भी दण्डनीय होगा ।
स्पष्टीकरण :
कोई राजकैदी या युद्धकैदी, जिसे अपने पैरोल (वचन/प्रतिज्ञा/इकरार जबानी) पर २.(भारत) में कतिपय सीमाओं के भीतर यथेच्छ विचरण की अनुज्ञा है, विधिपूर्ण अभिरक्षा से निकल भागा है, यह तब कहा जाता है, जब वह उन सीमाओं से परे चला जाता है, जिनके भीतर उसे यथेच्छ विचरण की अनुज्ञा है ।
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१. १९५५ के अधिनियम सं० २६ की धारा ११७ और अनुसूची द्वारा आजीवन निर्वासन के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
२. विधि अनुकूलन आदेश १९४८, विधि अनुकूलन आदेश १९५० और १९५१ के अधिनियम सं० ३ की धारा ३ और अनुसूची द्वारा ब्रिटिश भारत के स्थान पर प्रतिस्थापित किया गया ।

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